देश में कृषि भूमि से जुड़े पारिवारिक संपत्ति विवादों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) की धारा 22 कृषि भूमि पर भी पूरी तरह लागू होगी। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मृतक की कृषि भूमि उसके क्लास-I उत्तराधिकारियों (Class-I Heirs) को विरासत में मिली है और उनमें से कोई एक अपनी हिस्सेदारी किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है, तो अन्य सह-उत्तराधिकारियों को उस हिस्से को खरीदने का प्राथमिक (Preferential) अधिकार प्राप्त होगा।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला महिंदर एवं अन्य बनाम पूरन सिंह मामले में 14 जुलाई 2026 को सुनाया। अदालत ने अपील खारिज करते हुए प्रथम अपीलीय न्यायालय और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
क्या था मामला?
मामला हरियाणा के एक परिवार की विरासत में मिली कृषि भूमि से जुड़ा था। परिवार के कई भाई-बहनों ने अपनी हिस्सेदारी एक तीसरे व्यक्ति को बेचने का निर्णय लिया। इससे पहले ही परिवार के एक अन्य उत्तराधिकारी ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए दावा किया कि बाहरी व्यक्ति को भूमि बेचने से पहले उसे यह संपत्ति खरीदने का प्राथमिक अधिकार मिलना चाहिए।
ट्रायल कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन प्रथम अपीलीय न्यायालय और बाद में हाईकोर्ट ने धारा 22 को लागू मानते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
धारा 22 क्या कहती है?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, यदि किसी मृतक की अचल संपत्ति या व्यवसाय क्लास-I उत्तराधिकारियों को विरासत में मिलता है और उनमें से कोई एक अपनी हिस्सेदारी किसी बाहरी व्यक्ति को हस्तांतरित करना चाहता है, तो अन्य सह-उत्तराधिकारियों को उसे खरीदने का प्राथमिक अधिकार होगा। यदि कीमत पर सहमति नहीं बनती है, तो उसका निर्धारण अदालत करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 22 केवल संपत्ति के हस्तांतरण का प्रावधान नहीं है, बल्कि यह उत्तराधिकार (Succession) से जुड़ा अधिकार है। इसलिए यह कृषि भूमि पर भी लागू होगा। अदालत ने कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विरासत में मिली पारिवारिक संपत्ति यथासंभव परिवार के भीतर ही बनी रहे और बिना आवश्यकता बाहरी व्यक्ति उसमें शामिल न हो।
पीठ ने यह भी कहा कि पहले के Atam Prakash मामले में पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट की धारा 15 को असंवैधानिक ठहराया गया था, लेकिन उस फैसले को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 पर लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों कानूनों का उद्देश्य और दायरा अलग-अलग है।
संसद के अधिकार पर भी लगी मुहर
फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद को कृषि भूमि से संबंधित उत्तराधिकार कानून बनाने का पूरा अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) की प्रविष्टि-5 उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े मामलों को कवर करती है तथा इसमें कृषि भूमि को बाहर नहीं रखा गया है। इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 पूरी तरह वैध है और इसे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।
समय रहते दावा करना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 22 के तहत प्राथमिक अधिकार का प्रयोग संपत्ति की बिक्री पूरी होने से पहले किया जाना चाहिए। इस मामले में याचिकाकर्ता ने बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित होने से पहले ही अदालत में याचिका दाखिल कर दी थी। इसलिए बाद में अलग से बिक्री विलेख को चुनौती देने की आवश्यकता नहीं थी।
फैसले का व्यापक प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय देशभर में कृषि भूमि से जुड़े पारिवारिक विवादों में महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। अब यदि विरासत में मिली कृषि भूमि का कोई सह-उत्तराधिकारी अपनी हिस्सेदारी किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है, तो पहले अन्य क्लास-I उत्तराधिकारियों को उसे खरीदने का अवसर देना होगा। इससे पारिवारिक संपत्ति के संरक्षण और उत्तराधिकार संबंधी विवादों के समाधान में स्पष्टता आएगी।
यह फैसला विशेष रूप से उन लाखों परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी कृषि भूमि संयुक्त रूप से विरासत में मिली है और जहां भविष्य में हिस्सेदारी के हस्तांतरण को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।










