भारत की रक्षा खरीद नीति में एक बड़ा और रणनीतिक बदलाव सामने आया है। वैश्विक रक्षा अनुसंधान संस्थान SIPRI (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट) की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि भारत अब पहले की तुलना में अधिक विविध स्रोतों से हथियार और सैन्य उपकरण खरीद रहा है। इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ यूरोपीय देशों को मिला है, जिन्होंने सामूहिक रूप से भारत के प्रमुख रक्षा साझेदार के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है।
रूस की हिस्सेदारी लगातार घटी
करीब छह दशकों तक रूस (पूर्व सोवियत संघ सहित) भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान, सेना के टैंक, पनडुब्बियां और मिसाइल प्रणालियों का बड़ा हिस्सा रूसी मूल का है। लेकिन हालिया वर्षों में यह तस्वीर तेजी से बदली है।
SIPRI के अनुसार वर्ष 2021-2025 के दौरान भारत के कुल रक्षा आयात में रूस की हिस्सेदारी घटकर लगभग 40 प्रतिशत रह गई, जबकि 2016-2020 में यह 51 प्रतिशत थी। इससे पहले के दशक में यह हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से भी अधिक रही थी। यह गिरावट दर्शाती है कि भारत अब रक्षा खरीद के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
यूरोप क्यों बना सबसे बड़ा साझेदार?
रूस की घटती हिस्सेदारी के समानांतर फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और अन्य यूरोपीय देशों से भारत की रक्षा खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सामूहिक रूप से यूरोप अब भारत के लिए सबसे बड़ा रक्षा उपकरण स्रोत बन चुका है।
इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं—
- फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद।
- नौसेना के लिए अत्याधुनिक तकनीक आधारित सहयोग।
- एयरबस C-295 परिवहन विमान परियोजना।
- आधुनिक रडार, सेंसर, इंजन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों की खरीद।
- तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) और भारत में संयुक्त उत्पादन पर बढ़ता सहयोग।
यूरोपीय कंपनियां केवल हथियार बेचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर उत्पादन और अनुसंधान में भी भागीदारी बढ़ा रही हैं।
भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021-2025 के दौरान भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा और उसका वैश्विक हथियार आयात में 8.2 प्रतिशत हिस्सा रहा। हालांकि भारत के कुल रक्षा आयात में पिछले पांच वर्षों की तुलना में लगभग 4 प्रतिशत की मामूली कमी दर्ज की गई है। इसका एक प्रमुख कारण स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना माना जा रहा है।
अमेरिका और इज़राइल भी बने महत्वपूर्ण साझेदार
भारत की रक्षा खरीद में अमेरिका और इज़राइल की भूमिका भी लगातार बढ़ी है।
अमेरिका से भारत ने समुद्री निगरानी विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, इंजन और कई उन्नत सैन्य प्रणालियां खरीदी हैं। वहीं इज़राइल भारत को मिसाइल, ड्रोन, वायु रक्षा प्रणाली, निगरानी उपकरण तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली उपलब्ध करा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की नई नीति का उद्देश्य विभिन्न देशों से अत्याधुनिक तकनीक प्राप्त करना और किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करना है।
यूक्रेन युद्ध ने बदला वैश्विक रक्षा बाजार
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक रक्षा बाजार में बड़ा बदलाव आया है। रूस का रक्षा उत्पादन घरेलू जरूरतों और युद्ध के कारण प्रभावित हुआ, जिससे उसके निर्यात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
SIPRI के अनुसार 2021-2025 के दौरान रूस का वैश्विक हथियार निर्यात 64 प्रतिशत घट गया और वैश्विक निर्यात में उसकी हिस्सेदारी 21 प्रतिशत से घटकर 6.8 प्रतिशत रह गई। इसके विपरीत अमेरिका ने वैश्विक हथियार निर्यात में 42 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ अपनी बढ़त और मजबूत की।
आत्मनिर्भर भारत पर भी तेजी से काम
विदेशी खरीद के साथ-साथ भारत घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूत करने पर जोर दे रहा है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, मिसाइल, तोप, ड्रोन, बख्तरबंद वाहन, रडार और नौसैनिक प्लेटफॉर्म का निर्माण देश में किया जा रहा है।
रक्षा उत्पादन का मूल्य लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है और भारत का लक्ष्य आने वाले वर्षों में रक्षा निर्यात को भी उल्लेखनीय स्तर तक पहुंचाना है। इससे विदेशी आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की नई रणनीति केवल हथियार खरीदने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य आधुनिक तकनीक हासिल करना, रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाना, घरेलू उद्योग को मजबूत करना और बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल में रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना है।
भारत अब बहुध्रुवीय रक्षा साझेदारी (Multi-Alignment) की नीति पर आगे बढ़ रहा है, जिसमें रूस, यूरोप, अमेरिका, इज़राइल और अन्य देशों के साथ संतुलित सहयोग बनाए रखा जा रहा है।
भारत की रक्षा खरीद नीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। रूस अब भी भारत का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है, लेकिन उसकी एकाधिकार जैसी स्थिति समाप्त होती दिखाई दे रही है। यूरोप के साथ बढ़ता सहयोग, अमेरिका और इज़राइल की बढ़ती भूमिका तथा स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर सरकार का जोर आने वाले वर्षों में भारत को अधिक आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से सक्षम रक्षा शक्ति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। साथ ही, बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में यह रणनीति भारत को अधिक लचीला, संतुलित और दीर्घकालिक रक्षा ढांचा विकसित करने में मदद करेगी।










