वर्ष 2010 भारत के खेल इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। अपनी मेजबानी में खेले गए 19वें राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) में भारत ने न केवल शानदार आयोजन किया, बल्कि खेल के मैदान पर भी अपना परचम लहराया। भारत ने पहली बार 100 पदकों का जादुई आंकड़ा पार करते हुए कुल 101 पदक अपनी झोली में डाले, जिसमें 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य पदक शामिल थे।
इस ऐतिहासिक सफलता के साथ ही भारत ने पदक तालिका में इंग्लैंड को पछाड़ते हुए दूसरा स्थान प्राप्त किया। ऑस्ट्रेलिया पहले स्थान पर रहा, लेकिन भारत की यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि यह पहली बार था जब भारत ने इतनी बड़ी संख्या में स्वर्ण पदक जीते थे।
निशानेबाजी और कुश्ती में भारत को बढ़त
भारत की इस सफलता की नींव निशानेबाजों ने रखी। गगन नारंग और अभिनव बिंद्रा जैसे दिग्गजों ने सटीक निशानों से भारत को कई स्वर्ण पदक दिलाए। निशानेबाजी में भारत ने कुल 30 पदक जीते। वहीं कुश्ती में पहलवानों ने अपना दम दिखाते हुए कई स्वर्ण पदक अर्जित किए, जिसमें सुशील कुमार का प्रदर्शन अत्यंत प्रेरणादायक रहा।
अन्य खेलों में चमक
सिर्फ पारंपरिक खेलों में ही नहीं, बल्कि एथलेटिक्स में भी भारत ने इतिहास रचा। कृष्णा पूनिया ने चक्का फेंक (Discus Throw) में स्वर्ण पदक जीतकर 52 साल का सूखा खत्म किया। वहीं मुक्केबाजी में विजेंदर सिंह और बैडमिंटन में सायना नेहवाल की स्वर्णिम सफलता ने देश को गौरवान्वित किया। अंतिम दिन बैडमिंटन महिला एकल में सायना नेहवाल द्वारा जीता गया स्वर्ण पदक वह पल था जिसने भारत को पदक तालिका में दूसरे स्थान पर पक्का कर दिया।
एक नई खेल संस्कृति की शुरुआत
इन खेलों ने भारत में क्रिकेट से इतर अन्य खेलों के प्रति एक नई जागरूकता पैदा की। दिल्ली की सड़कों से लेकर स्टेडियम तक 'शेरा' (मस्कट) के साथ गूँजता 'जय हो' का संगीत आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। 2010 के इन खेलों ने यह साबित कर दिया कि यदि बुनियादी ढांचा और सही प्रोत्साहन मिले, तो भारतीय खिलाड़ी वैश्विक स्तर पर किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।








