सदियों का इंतजार, दशकों की कानूनी लड़ाई और करोड़ों लोगों की आस्था... आखिरकार शनिवार को देश की सबसे बड़ी अदालत ने अयोध्या विवाद पर 'अंतिम मुहर' लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1045 पन्नों के ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया कि विवादित जमीन रामलला विराजमान की ही है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाए ताकि भव्य राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू हो सके।CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली संवैधानिक पीठ ने कहा कि पुरातात्विक सबूतों (ASI) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खुदाई में मिले अवशेष बताते हैं कि मस्जिद किसी खाली जमीन पर नहीं बनी थी, उसके नीचे एक विशाल प्राचीन ढांचा था। कोर्ट ने माना कि बाहरी चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू पहले से ही पूजा करते रहे थे। हालांकि, कोर्ट ने 1992 में ढांचा गिराए जाने की घटना को कानून का उल्लंघन जरूर बताया, लेकिन मालिकाना हक साक्ष्यों के आधार पर हिंदुओं को दिया।
अदालत ने 'आर्टिकल 142' की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मुस्लिम पक्ष के साथ नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए। इसलिए, सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या के भीतर ही किसी प्रमुख और उपयुक्त स्थान पर 5 एकड़ जमीन देने का कड़ा निर्देश दिया गया है।
फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि यह फैसला किसी की जीत या हार नहीं है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं की जीत है। उन्होंने जनता से 'शांति, एकता और सद्भाव' बनाए रखने की अपील की। पूरे देश में हाई अलर्ट के बावजूद माहौल पूरी तरह शांत बना हुआ है और अयोध्या की गलियों में 'जय श्रीराम' के उद्घोष के साथ-साथ भाईचारे की मिसाल देखने को मिल रही है।










