अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) द्वारा जारी एक सामान्य लाइसेंस में ईरानी मूल के कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन, डिलीवरी तथा बिक्री से संबंधित कुछ गतिविधियों को 21 अगस्त 2026 तक अधिकृत किए जाने की जानकारी सामने आई है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ने की संभावना बनी है, जिससे आपूर्ति को लेकर चिंताएं कम हुई हैं। संभावित अतिरिक्त आपूर्ति की उम्मीद ने अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बनाया और बाजार में बिकवाली देखने को मिली।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट सकारात्मक मानी जा रही है, क्योंकि इससे आयात लागत पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई इस गिरावट के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, भारत में ईंधन कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करतीं। विनिमय दर, कर संरचना, परिवहन लागत और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति जैसे कई कारक भी खुदरा कीमतों को प्रभावित करते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक निचले स्तर पर बनी रहती हैं और आपूर्ति संबंधी स्थिति मजबूत रहती है, तो इसका लाभ आगे चलकर भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं को मिल सकता है।










