कल की सुबह जब सूरज की पहली किरण के साथ मतगणना केंद्रों के ताले खुले, तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि शाम होते-होते भारत का राजनीतिक नक्शा इतना बदल जाएगा। इस कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ, जहाँ पिछले डेढ़ दशक से ममता बनर्जी का एकछत्र राज था। जैसे-जैसे ईवीएम से वोटों की गिनती आगे बढ़ी, 'दीदी' के गढ़ में 'भगवा' लहर साफ दिखने लगी। अंततः बंगाल की 294 सीटों में से भाजपा ने 206 सीटों पर कब्जा कर सबको हैरान कर दिया, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस मात्र 81 सीटों पर सिमट गई। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी ही सीट पर हार का स्वाद चखना पड़ा।
कहानी का दूसरा बड़ा मोड़ दक्षिण भारत के तमिलनाडु से आया। यहाँ दशकों से द्रविड़ राजनीति की दो धुरियां, डीएमके और एआईएडीएमके, राज करती आई थीं। लेकिन इस बार सुपरस्टार विजय की नई पार्टी 'TVK' ने पर्दे के नायक से सत्ता के नायक तक का सफर महज चंद घंटों में तय कर लिया। तमिलनाडु की 234 सीटों की जंग में विजय की पार्टी 108 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, जिससे सत्ताधारी डीएमके मात्र 59 सीटों और एआईएडीएमके 47 सीटों पर रह गई। बहुमत के 118 के आंकड़े के करीब पहुंचकर विजय ने दिखा दिया कि तमिलनाडु की जनता अब सिनेमा और राजनीति के एक नए संगम के लिए तैयार है।
इसी बीच, केरल और असम की वादियों से भी बदलाव और स्थिरता की दो अलग-अलग कहानियां सुनने को मिलीं। केरल के मतदाताओं ने अपनी पुरानी परंपरा को निभाते हुए इस बार 'लाल किले' को ढहा दिया। राज्य की 140 सीटों में से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने 102 सीटों पर जीत दर्ज कर शानदार वापसी की, जबकि पिनाराई विजयन का एलडीएफ गठबंधन केवल 35 सीटों पर सिमट गया। वहीं दूसरी ओर, असम में हिमंत बिस्वा सरमा एक अजेय योद्धा की तरह सामने आए। यहाँ की 126 सीटों में से एनडीए ने 102 सीटों पर भारी जीत हासिल कर सत्ता में अपनी 'हैट्रिक' पूरी की, जहाँ कांग्रेस के हाथ महज 19 सीटें ही लग सकीं।
पुडुचेरी की छोटी सी राजनीतिक बिसात पर भी हलचल कम नहीं थी, जहाँ 30 सीटों के मुकाबले में एआईएनआरसी और भाजपा गठबंधन ने 16 सीटें जीतकर अपनी सत्ता बरकरार रखी। कल की यह पूरी कहानी हमें बताती है कि जनता अब चेहरों और वादों को परखने में देर नहीं लगाती। शाम ढलते-ढलते जब विजय के घर के बाहर जश्न का शोर था और कोलकाता की गलियों में सत्ता परिवर्तन का गुलाल उड़ रहा था, तब एक बात साफ हो गई कि 2026 का यह जनादेश आने वाले कई सालों तक भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। यह हारने वालों के लिए आत्ममंथन की रात थी और जीतने वालों के लिए एक नई जिम्मेदारी का सवेरा।








